बेंजामिन नेतन्याहू के चुनावी भविष्य पर नजर, भारत-इज़राइल रिश्तों को लेकर उठे सवाल

इज़राइल में मतदान से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर सबकी नजर है। भारत के साथ उनके करीबी संबंधों ने दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक और कूटनीति में सहयोग को बढ़ाने में भूमिका निभाई है। अब सवाल उठ रहा है कि अगर नेतन्याहू सत्ता से बाहर हुए, तो क्या भारत के साथ रिश्तों की दिशा बदलेगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में पीछे चल रहे हैं और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं। आइज़ेनकोट ने पश्चिमी साझेदारों के साथ संबंध फिर मजबूत करने की बात कही है। इससे चर्चा शुरू हुई है कि नई सरकार के तहत भारत को वही कूटनीतिक महत्व मिलेगा या नहीं।
भारत के लिए दांव केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू की निजी दोस्ती तक सीमित नहीं हैं। इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण रक्षा और तकनीकी साझेदार है। हाइफ़ा बंदरगाह में भारतीय निवेश, संयुक्त सैन्य परियोजनाएं, प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा भी दोनों देशों के सहयोग का हिस्सा हैं।
दोनों देशों ने जनवरी 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। मोदी की जुलाई 2017 की इज़राइल यात्रा किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली ऐसी यात्रा थी और इसने संबंधों को सार्वजनिक रूप से खास पहचान दी। उस समय नेतन्याहू ने मोदी का स्वागत करते हुए कहा था कि इज़राइल ने भारत के प्रधानमंत्री के आने का 70 साल इंतजार किया।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि नेतन्याहू ने हाल में भारत को अमेरिका पर निर्भरता कम करने की अपनी सोच में एक अहम साझेदार बताया। वहीं, भारत के ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी संबंध हैं, इसलिए क्षेत्रीय स्थिरता नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण है।
नेतन्याहू के संभावित राजनीतिक भविष्य पर यह चर्चा ऐसे समय हो रही है जब भारत-इज़राइल संबंध कई क्षेत्रों में फैल चुके हैं। लेख का मुख्य सवाल यही है कि क्या नेतृत्व में बदलाव से इन रणनीतिक परियोजनाओं और सहयोग की गति प्रभावित होगी, या दोनों देशों के संस्थागत संबंध स्थिर बने रहेंगे।
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